उन्नाव। उत्तर प्रदेश के कोने-कोने में कलमकारों का दर्द गहराता जा रहा है। लोकतंत्र का प्रहरी कहे जाने वाले पत्रकार आज सबसे असुरक्षित और उपेक्षित वर्ग बन गए हैं। जिनकी कलम से भ्रष्टाचार का पर्दाफाश होता है। जिनकी आवाज से जनता को न्याय मिलता है। वही पत्रकार आज अपनों के बीच अकेला और असहाय खड़ा है।
📌 सच लिखने की कीमत – झूठे मुकदमे और जेल
पत्रकारों की सबसे बड़ी पीड़ा यह है। कि जब वे सच्चाई को सामने लाते हैं, तो उन पर झूठे मुकदमे लाद दिए जाते हैं।
कोई घोटाला उजागर किया तो गंभीर धाराओं में एफआईआर।
पुलिस की लापरवाही पर खबर लिखी तो आईटी एक्ट लगा दिया।
नेताओं के खिलाफ तथ्य रखे तो गैंगस्टर एक्ट तक ठोक दिया गया।
कई पत्रकार महीनों जेल में बंद रहे, जबकि उनकी गलती सिर्फ इतनी थी कि उन्होंने सच्चाई सामने रखी।
📌 खतरों के साए में पत्रकारिता
पत्रकार बताते हैं। कि अब हालात ऐसे हो गए हैं कि खबर लिखते समय उन्हें सबसे पहले अपनी सुरक्षा और परिवार का ख्याल आता है।
“हम अपने बच्चों को पढ़ाई लिखाई सिखाना चाहते हैं, लेकिन डर यह है कि कहीं हमारी कलम की वजह से उनका बचपन न उजड़ जाए।”
“हम दूसरों की लड़ाई लड़ते हैं, पर अपने लिए बोलने वाला कोई नहीं।”
“खबर लिखते समय अब यह सोचना पड़ता है कि कल पुलिस थाने जाना पड़ेगा या घर पर कोई धमकी भरा फोन आएगा।”
📌 हमले, हत्याएं और खामोश सिस्टम
सिर्फ मुकदमे ही नहीं, बल्कि पत्रकारों पर शारीरिक हमले और हत्याएं भी आम हो गई हैं।
कहीं दबंगों ने दिनदहाड़े पीटा, तो कहीं रात में घर लौटते समय गोली मार दी गई।
कई मामलों में तो हत्यारे आज भी खुले घूम रहे हैं, और पीड़ित परिवार इंसाफ की राह ताक रहा है।
पत्रकार संगठनों का कहना है कि अगर यही हाल रहा तो पत्रकारिता करने वाला हर शख्स डर और खामोशी का शिकार हो जाएगा।
📌 पत्रकारों का दर्द – आत्मसम्मान से समझौता
पत्रकारों की सबसे बड़ी तकलीफ यह है कि उन्हें मजबूरन अपने आत्मसम्मान से समझौता करना पड़ रहा है।
“सत्ता और रसूखदारों के खिलाफ सच लिखो तो नोकरी पर खतरा, मुकदमे झेलो और जान का डर झेलो।”
“चुप रहो तो जनता से गद्दारी और बोलो तो खुद बरबाद हो जाओ।”
यही दुविधा आज हर छोटे-बड़े पत्रकार के जीवन का हिस्सा बन चुकी है।
📌 पत्रकारों की मांगें
1. पत्रकार सुरक्षा कानून लागू हो, ताकि किसी भी हमले या मुकदमे पर तुरंत कार्रवाई हो सके।
2. फर्जी मुकदमों की समीक्षा के लिए स्वतंत्र समिति बने।
3. हमले और हत्याओं की न्यायिक जांच हो, ताकि दोषियों को सजा मिल सके।
4. पत्रकारिता को अपराध नहीं, बल्कि लोकतंत्र की नींव मानकर उसका सम्मान किया जाए।
👉 जर्नलिस्ट प्रेस क्लब एसोसिएशन उत्तर प्रदेश के प्रदेश अध्यक्ष हरिओम गुप्ता (विशाल) जी ने कहा कि पत्रकारों का यह दर्द सिर्फ उनका निजी संघर्ष नहीं है। बल्कि पूरे लोकतंत्र का संकट है। अगर कलम की आवाज दबाई गई तो जनता की आवाज भी कभी शासन तक नहीं पहुंचेगी। पत्रकारों पर हो रहे हमले और झूठे मुकदमे सिर्फ उनका निजी संकट नहीं है।बल्कि आम जनता के अधिकारों पर सीधा प्रहार है। जब पत्रकार डरकर चुप हो जाते हैं। तो भ्रष्टाचार, अन्याय और शोषण की कहानियाँ सामने नहीं आ पातीं। इसका सबसे बड़ा नुकसान जनता को होता है।क्योंकि शासन तक उनकी आवाज़ पहुँचाने वाला कोई नहीं बचता। लोकतंत्र की असली ताकत आज़ाद पत्रकारिता है।और अगर यही आवाज़ दबा दी गई तो आम लोगों की समस्याएँ भी अंधेरे में ही दबी रह जाएंगी।









