भगत सिंह की याद में गोष्ठी, कानपुर की क्रांतिकारी विरासत पर चर्चा – कानपुर के फजलगंज स्थित प्रताप सिंह पार्क के समीप स्थापित Bhagat Singh की प्रतिमा के पास एक सार्थक लघु गोष्ठी का आयोजन किया गया, जिसमें शहर के साहित्यकारों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और जागरूक नागरिकों ने भाग लेकर शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित की। कार्यक्रम का आयोजन डॉ. आर.के. विश्वकर्मा के क्लीनिक परिसर में किया गया, जहां देशभक्ति और ऐतिहासिक चेतना से जुड़ा गंभीर विमर्श देखने को मिला।
गोष्ठी को संबोधित करते हुए देवेंद्र श्रीवास्तव ने प्रसिद्ध गीतकार Shailendra की मार्मिक पंक्तियों को याद किया—
“भगत सिंह इस बार न लेना काया भारतवासी की,
देशभक्ति के लिए आज भी सजा मिलेगी फांसी की।”
इन पंक्तियों के माध्यम से उन्होंने वर्तमान समय में देशभक्ति की बदलती परिभाषा और उसके सामने खड़ी चुनौतियों की ओर संकेत किया।
कार्यक्रम में वक्ता प्रताप साहनी ने Kanpur की क्रांतिकारी पृष्ठभूमि पर विस्तार से प्रकाश डालते हुए बताया कि यह शहर केवल औद्योगिक पहचान तक सीमित नहीं रहा, बल्कि स्वतंत्रता संग्राम में इसकी भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही है। उन्होंने विशेष रूप से Ganesh Shankar Vidyarthi के बलिदान को याद करते हुए कहा कि 23-24 मार्च 1931 के दौरान हुए सांप्रदायिक दंगों में गणेश शंकर विद्यार्थी ने मानवता और सामाजिक सौहार्द की रक्षा करते हुए अपने प्राणों की आहुति दी।
वक्ताओं ने इस बात पर चिंता जताई कि 1857 से ही हिंदू-मुस्लिम एकता के मजबूत केंद्र के रूप में पहचान रखने वाले कानपुर की सामाजिक संरचना को समय-समय पर कमजोर करने की कोशिशें हुईं। विशेषकर 1931 के बाद शहर के सामाजिक समीकरणों में आए बदलावों को ऐतिहासिक दृष्टि से समझने की आवश्यकता पर जोर दिया गया।
गोष्ठी में उपस्थित वक्ताओं—राज कुमार अग्निहोत्री, अतरसिंह, ज्ञान तिवारी, वैभव मिश्रा, देवेंद्र श्रीवास्तव और डॉ. आर.के. विश्वकर्मा—ने शहीदों के आदर्शों को आज के संदर्भ में प्रासंगिक बताते हुए कहा कि स्वतंत्रता केवल एक ऐतिहासिक घटना नहीं, बल्कि निरंतर जागरूकता और जिम्मेदारी की मांग करती है।
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इस अवसर पर Ram Manohar Lohia का भी उल्लेख किया गया। वक्ताओं ने बताया कि 23 मार्च को ही जन्मे डॉ. लोहिया ने जब बाद में यह जाना कि इसी दिन भगत सिंह को फांसी दी गई थी, तो उन्होंने अपने जन्मदिन को कभी उत्सव के रूप में नहीं मनाया। यह उनके भीतर शहीदों के प्रति सम्मान और संवेदनशीलता का प्रतीक था।
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कार्यक्रम के अंत में भगत सिंह की प्रतिमा पर माल्यार्पण कर उन्हें श्रद्धांजलि दी गई। गोष्ठी की अध्यक्षता युवा लेखक देव कबीर ने की, जबकि संचालन कमलेश कुमार द्वारा किया गया।
यह गोष्ठी केवल एक श्रद्धांजलि कार्यक्रम नहीं थी, बल्कि यह इतिहास, सामाजिक एकता और वर्तमान समय की चुनौतियों पर गंभीर चिंतन का मंच भी बनी। वक्ताओं ने स्पष्ट किया कि शहीदों की याद तभी सार्थक है जब उनके विचारों को समाज में जीवित रखा जाए और उन्हें व्यवहार में उतारा जाए।









