मुलायम सिंह: उत्तर प्रदेश की राजनीति में “धरती पुत्र” कहे जाने वाले मुलायम सिंह यादव का नाम केवल एक व्यक्ति नहीं, बल्कि एक युग का प्रतीक रहा है — वह युग जब राजनीति मिट्टी से उठकर जनमानस से जुड़ती थी। आज उनकी पुण्यतिथि पर उन्हें याद करना, केवल एक नेता को श्रद्धांजलि देना नहीं, बल्कि उस विचारधारा को परखना है जिसने सत्ता से अधिक संघर्ष को महत्व दिया था।
जीवन परिचय और प्रारंभिक संघर्ष
22 नवंबर 1939 को सैफई (जिला इटावा) में जन्मे मुलायम सिंह यादव एक साधारण किसान परिवार से उठकर देश की सबसे बड़ी राजनीति के केंद्र तक पहुंचे।
उनका जीवन संघर्ष, अनुशासन और जन-संपर्क की पाठशाला था।
राममनोहर लोहिया के समाजवाद से प्रभावित होकर वे छात्र राजनीति में सक्रिय हुए और 1967 में पहली बार विधायक बने।
आपातकाल में जेल, फिर जनता पार्टी से लेकर समाजवादी पार्टी की स्थापना तक का सफर — यह सब उस पीढ़ी की कहानी है जिसने विचारों पर राजनीति की नींव रखी।
राजनीति में ‘धरती पुत्र’ की पहचान
मुलायम सिंह का नाम उत्तर प्रदेश की राजनीति में किसान, पिछड़े वर्ग और अल्पसंख्यकों की आवाज़ के प्रतीक के रूप में दर्ज हुआ।
उनकी बोलचाल की देसी सादगी, हाथ जोड़कर मिलना, और गाँव-जमीन से जुड़ा रवैया — यही उनकी ताकत थी।
उन्होंने सत्ताधारी और विपक्ष दोनों में रहते हुए यह साबित किया कि राजनीति सिर्फ दिल्ली या लखनऊ की नहीं, बल्कि गाँव की चौपाल की भी होती है।
1990 के दशक में जब मंडल-कमंडल की राजनीति अपने चरम पर थी, तब उन्होंने “सत्ता नहीं, समाज” की बात की — हालाँकि अयोध्या गोलीकांड ने उनकी छवि को हमेशा के लिए विभाजित कर दिया।
समकालीनों की नज़र में मुलायम सिंह
उनके समकालीन नेताओं की राय उनके जटिल लेकिन प्रभावशाली व्यक्तित्व को स्पष्ट करती है:
अटल बिहारी वाजपेयी ने उन्हें “व्यवहार कुशल लेकिन राजनीति में धुर प्रतिद्वंदी” कहा था। वाजपेयी कहा करते थे, “मुलायम जी से असहमत हुआ जा सकता है, लेकिन उन्हें नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।”
लालू प्रसाद यादव, जो उनके वैचारिक साथी भी थे, मानते थे कि “मुलायम भाई ज़मीन से जुड़े आख़िरी असली समाजवादी हैं।”
मायावती, जिनसे उनका राजनीतिक टकराव 1995 के “गेस्ट हाउस कांड” तक चला, बाद में भी मानती रहीं कि “मुलायम सिंह विरोधी जरूर थे, पर विपक्ष का सम्मान करना जानते थे।”
शरद पवार और नीतीश कुमार जैसे नेता उन्हें “राजनीति का खिलाड़ी” कहते थे, जो हर गठबंधन को अपनी सुविधा के अनुसार ढाल लेते थे, लेकिन निष्ठा अपने कार्यकर्ताओं के प्रति कभी नहीं छोड़ते थे।
नरेंद्र मोदी ने भी संसद में उनके निधन पर कहा था, “मुलायम सिंह हमारे विरोधी रहे, पर उनके भीतर गहरी मानवता थी। उन्होंने हमें हमेशा आशीर्वाद दिया।”
इन सभी प्रतिक्रियाओं से स्पष्ट है कि मुलायम सिंह को विरोधी भी एक “राजनीतिक संस्थान” के रूप में स्वीकार करते थे।
समाजवाद से परिवारवाद तक: बदलती धारा
मुलायम सिंह की ताकत — “परिवार और संगठन पर नियंत्रण” — ही बाद में समाजवादी पार्टी की सबसे बड़ी कमजोरी बनी।
जहाँ लोहिया का समाजवाद विचारों और संघर्षों पर आधारित था, वहीं धीरे-धीरे वह रिश्तों और सत्ताओं की खींचतान में सिमट गया।
सैफई परिवार की आंतरिक राजनीति ने सपा की जड़ों को कमजोर किया।
शिवपाल बनाम अखिलेश की लड़ाई ने जनता के सामने यह प्रश्न खड़ा किया — क्या समाजवाद अब केवल परिवार का विस्तार बन गया है?
अखिलेश यादव: विरासत की कसौटी पर
अखिलेश यादव निस्संदेह आधुनिक समाजवाद का चेहरा हैं — पढ़े-लिखे, शहरी दृष्टि वाले और तकनीक के दौर में फिट।
पर उनके सामने दोहरी चुनौती है:
- विचारधारा को पुनर्जीवित करना ताकि पार्टी सिर्फ जातीय समीकरणों पर न टिके,
- विश्वास की राजनीति लौटाना ताकि समाजवाद फिर एक व्यापक आंदोलन बन सके।
अखिलेश के पास वह ऊर्जा है जो युवाओं को आकर्षित करती है, पर वे उस भावनात्मक जुड़ाव तक नहीं पहुँच पाए हैं जो उनके पिता की पहचान थी।
भविष्य का समाजवाद तभी जिंदा रहेगा जब “मुलायम की सादगी” और “अखिलेश की आधुनिकता” एक-दूसरे का पूरक बनें।
मुलायम सिंह पर आई किताबें और उनका प्रभाव
मुलायम सिंह यादव पर कई किताबें लिखी गईं —
“Netaji: The Making of a Leader” (सुनीता एरॉन)
“Mulayam Singh Yadav: A Political Biography” (अखिलेश मिश्रा)
“The Socialist: Life and Times of Mulayam Singh Yadav” (धर्मेंद्र यादव)
इनमें उनके संघर्षशील जीवन, चुनावी रणनीतियों और वैचारिक द्वंद्व का सूक्ष्म चित्रण मिलता है। ये किताबें बताती हैं कि मुलायम सिंह सिर्फ सत्ता के खिलाड़ी नहीं, बल्कि एक विचारधारा के वाहक भी थे।
ग्रामोदय से भारतोदय तक: नवाचार की नई परिभाषा गढ़ता ग्रामीण भारत
समाजवाद की नई परिभाषा या पुनर्जन्म की ज़रूरत?
आज समाजवादी पार्टी के सामने प्रश्न सिर्फ चुनावी अस्तित्व का नहीं, बल्कि वैचारिक पुनर्जन्म का है।
मुलायम सिंह का समाजवाद “गरीब की ताकत” था; आज वही विचारधारा “परिवार की सीमा” में बंधी है।
अगर अखिलेश इस सीमा को तोड़कर समाजवाद को जनता तक वापस ले आएँ —
तो “धरती पुत्र” की विरासत केवल स्मृति नहीं, फिर से एक आंदोलन बन जाएगी।
वरना आने वाली पीढ़ियाँ उन्हें आख़िरी असली समाजवादी कहकर याद करेंगी।
गाजा – युद्धविराम या कुछ और ?
अंतिम शब्द:
मुलायम सिंह यादव ने राजनीति को जमीनी भाषा दी, और सत्ता को एक मानवीय चेहरा।
उनकी विरासत यह याद दिलाती है कि राजनीति में विनम्रता, संघर्ष और धरातल से जुड़ाव कभी पुराने नहीं होते।
आज की राजनीति में जब विचारधारा की जगह चतुराई ने ले ली है, तब “धरती पुत्र” की स्मृति हमें यह सिखाती है —
वोट से बड़ी चीज़ है विश्वास, और सत्ता से बड़ा शब्द है समाज।







