पटाखों पर सुप्रीम कोर्ट: दीपावली का त्यौहार नजदीक आते ही एक पुराना सवाल फिर लौट आया है — क्या रोशनी का पर्व बिना पटाखों के अधूरा है, या अब वक्त है कि परंपरा को नए अर्थों में समझा जाए? हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि पटाखों पर किसी तरह का पूर्ण प्रतिबंध नहीं लगाया गया है, लेकिन राज्य सरकारों और पुलिस प्रशासन को यह सुनिश्चित करने के निर्देश दिए हैं कि प्रतिबंधित और विषैले रसायनों वाले पटाखे बाजार में न बिकें।
यह फैसला ऐसे समय आया है जब देश के कई हिस्सों में प्रदूषण खतरनाक स्तर पर पहुँच चुका है। दिल्ली, लखनऊ, और पटना जैसे शहरों में AQI 300 से ऊपर दर्ज किया गया है — जो “बहुत खराब” श्रेणी में आता है। हर साल दीपावली के बाद इन शहरों की हवा में सूक्ष्म कणों (PM 2.5) की मात्रा सामान्य से 5 से 7 गुना बढ़ जाती है।
पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि दीपावली के दिनों में श्वसन संबंधी बीमारियों के मामलों में 20-25% तक की बढ़ोतरी देखी जाती है। बच्चे, बुजुर्ग और पशु इस प्रदूषण से सबसे अधिक प्रभावित होते हैं। पटाखों की तेज़ आवाज़ से जानवरों में घबराहट और हृदयगति संबंधी समस्याएं तक देखने को मिलती हैं। ऐसे में, सवाल केवल परंपरा का नहीं बल्कि संवेदनशीलता का भी है।
हालांकि दूसरी ओर, पटाखा उद्योग में सीधे तौर पर 3 लाख से अधिक लोग कार्यरत हैं — जिनमें तमिलनाडु के शिवकाशी जैसे क्षेत्र सबसे बड़े केंद्र हैं। उद्योग जगत का कहना है कि “ग्रीन क्रैकर्स” यानी ऐसे पटाखे जिनमें सल्फर और नाइट्रेट की मात्रा कम हो, एक वैकल्पिक रास्ता बन सकते हैं। परंतु जमीनी स्तर पर इनका उत्पादन और निगरानी अभी भी सीमित है।
समाज के एक वर्ग का तर्क है कि त्योहारों में पटाखे सिर्फ शोर या प्रदूषण नहीं, बल्कि भावनाओं और सांस्कृतिक उत्सव का हिस्सा हैं। लेकिन दूसरी तरफ यह भी सच है कि परंपरा तभी टिकती है जब वह वक्त और विवेक के साथ विकसित हो। दीपावली के प्रतीक को सिर्फ धुएं और धमाके से जोड़ना शायद उस “दीप” के मूल अर्थ से दूर जाना है, जो अंधकार को मिटाने का प्रतीक है।
ऐसे में संतुलन ही रास्ता है — न परंपरा को पूरी तरह त्यागना और न ही पर्यावरण की अनदेखी करना। दीपावली की सच्ची भावना तभी जीवित रह सकती है जब रोशनी, जिम्मेदारी और करुणा साथ-साथ चलें।
अंतिम संदेश (News 80 की ओर से):
त्योहार खुशी का प्रतीक हैं, लेकिन खुशियों की असली रोशनी तभी है जब सबकी साँसें सुरक्षित हों — चाहे वे बच्चे हों, बुजुर्ग हों या वो बेजुबान जानवर जो हमारे बीच रहते हैं। दीपावली मनाइए, मगर इस बार संवेदनशीलता की लौ जलाइए।









