धुरंधर को लेकर मीडिया और सोशल मीडिया पर चर्चा का बड़ा हिस्सा या तो इसके स्केल, स्टारकास्ट और देशभक्ति के जोश तक सीमित रहा, या फिर इसे एकतरफ़ा खाँचों में रखकर देखा गया। लेकिन इस फिल्म के भीतर कुछ ऐसी परतें भी हैं, जिन पर कम ध्यान गया—और वही इसे एक साधारण स्पाई-थ्रिलर से अलग बनाती हैं।
सबसे पहले फिल्म की मनोवैज्ञानिक बनावट पर बात जरूरी है। धुरंधर केवल मिशन और दुश्मन की कहानी नहीं है, बल्कि उन लोगों की भी है जो लगातार दोहरी ज़िंदगी जीते हैं। नायक का संघर्ष सिर्फ बाहरी नहीं, आंतरिक भी है—पहचान का, भरोसे का और नैतिक सीमाओं का। फिल्म कई जगह यह सवाल उठाती है कि राष्ट्र की रक्षा करते-करते व्यक्ति खुद कितना टूटता है, लेकिन यह सवाल शोरगुल वाले दृश्यों में दब जाता है।
मीडिया ने जहाँ अभिनय को “दमदार” कहकर आगे बढ़ा दिया, वहीं सहायक किरदारों की खामोश ताकत लगभग नज़रअंदाज़ हो गई। कुछ पात्र बहुत कम संवादों में अपनी मौजूदगी दर्ज कराते हैं—वे नायक नहीं हैं, लेकिन कहानी की नैतिक रीढ़ वही हैं। खास बात यह है कि फिल्म उन्हें पूरी तरह काला या सफ़ेद नहीं बनाती; ग्रे शेड्स में छोड़ देती है, जो आज के समय की सच्चाई के ज़्यादा करीब है।
फिल्म की एक कम चर्चित परत है इसका स्थान और वातावरण का इस्तेमाल। शहर, गलियाँ, अंधेरे कमरे और सीमापार के इलाके केवल लोकेशन नहीं लगते, बल्कि पात्रों की मानसिक अवस्था का विस्तार बन जाते हैं। कई दृश्य ऐसे हैं जहाँ संवाद नहीं, सिर्फ़ माहौल कहानी कहता है—लेकिन रील्स और रिव्यूज़ में इन्हें शायद ही जगह मिली।
जहाँ सोशल मीडिया ने फिल्म को या तो “देशभक्ति का प्रतीक” या “प्रचार” कहकर बांट दिया, वहीं फिल्म खुद इतनी सरल नहीं है। इसमें राष्ट्रवाद है, लेकिन वह हमेशा उत्सव की तरह नहीं आता—कई बार वह बोझ की तरह भी दिखता है। यह पहलू उन दर्शकों के लिए ज्यादा असरदार है जो फिल्म को नारे की तरह नहीं, अनुभव की तरह देखते हैं।
कमज़ोरियों की बात भी ईमानदारी से होनी चाहिए। फिल्म का रनटाइम कई जगह कसाव मांगता है। कुछ दृश्य प्रभावशाली होने के बावजूद दोहराव का एहसास देते हैं। इसके अलावा, कुछ संवेदनशील संदर्भों को और संतुलित तरीके से संभाला जा सकता था, ताकि अनावश्यक विवाद से बचा जा सके।
दिलीप कुमार: पुण्यतिथि विशेष
धुरंधर की सबसे अनदेखी खासियत यह है कि यह दर्शक से तालियाँ नहीं, धैर्य मांगती है। यह फिल्म तुरंत निर्णय देने को नहीं कहती—यह छोड़ देती है कि दर्शक खुद तय करे कि सही क्या था और गलत क्या। शायद इसी वजह से यह फिल्म देखने के बाद खत्म नहीं होती, बल्कि भीतर चलती रहती है।
भारत को भीतर-ही-भीतर खा रहा भ्रष्टाचार: एक कठोर लेकिन ज़रूरी सच्चाई
निष्कर्षतः, धुरंधर न तो पूरी तरह बेदाग है, न ही खारिज किए जाने लायक। यह एक महत्वाकांक्षी, सोचने पर मजबूर करने वाली फिल्म है, जिसकी असली ताकत उसके शोर में नहीं, उसकी खामोशियों में छुपी है। और शायद सिनेमा का असली असर भी वहीं से शुरू होता है—जहाँ कहानी पर्दे से उतरकर इंसान के भीतर सवाल छोड़ जाती है।









