गाली का मनोविज्ञान और राजनीति का नाटक
हाल ही में बिहार की सियासत में एक नया शोर उठा। एक स्थानीय नेता ने प्रधानमंत्री के लिए अभद्र भाषा का प्रयोग कर दिया। मीडिया ने इसे सुर्खियों में उछाला, बहस के मंच गरमा गए, और राजनीतिक गलियारों में बयानबाज़ी का दौर शुरू हो गया। जिस गाली को आम ज़िंदगी में लोग सैकड़ों बार सुनते और बोलते हैं, वही जब सत्ता और राजनीति की दुनिया में गूँजती है, तो अचानक से ‘लोकतंत्र का अपमान’ और ‘संस्कृति का संकट’ बन जाती है।
असल सवाल यह है कि गाली क्या है? क्या यह सिर्फ़ अपमान है या एक सामाजिक-मानसिक दबाव की स्वाभाविक निकासी? और क्या राजनीति में इसे भावनात्मक हथियार बनाना जनता के असली मुद्दों से ध्यान भटकाना नहीं है?
गाली: मनोवैज्ञानिक परिप्रेक्ष्य
मनोविज्ञान कहता है कि गाली मनुष्य की स्वाभाविक अभिव्यक्ति है। जब इंसान तनाव में होता है, गुस्से में होता है या खुद को कमज़ोर पाता है, तो उसकी ज़ुबान पर सबसे आसान निकास ‘गाली’ होती है। यह दरअसल निराशा और असहायता का भाषा रूप है।
गाली देना अक्सर वह व्यक्ति करता है जिसके पास उस पल तर्क या साधन नहीं होते।
गाली बोलने से तनाव अस्थायी रूप से कम होता है, जैसे किसी ने गुस्से में दीवार पर मुक्का मार दिया हो।
शोध बताते हैं कि गाली देने वाले लोग ज़रूरी नहीं कि असभ्य हों; वे भावनाओं को जल्दी बाहर निकालकर हल्का हो जाते हैं।
हमारे समाज में गाली केवल गुस्से की भाषा नहीं है, बल्कि कभी-कभी अपनापन जताने का तरीका भी है। दोस्तों की मंडली में, मोहल्ले के नुक्कड़ पर, या खेत-खलिहान में गाली एक किस्म का मज़ाक, हास्य और ‘लोक संस्कृति’ का हिस्सा है। गाँव के चौपाल से लेकर शहर की चाय की दुकान तक, गाली किसी न किसी रूप में मौजूद रहती है।
गाली और समाज का दोहरा चेहरा
दिलचस्प यह है कि समाज खुद गाली को ‘पाप’ और ‘ग़लत’ बताता है, लेकिन हर तबके और हर वर्ग में यह बोली जाती है।
घर में बच्चे गलती से गाली बोल दें तो डाँट मिलती है, लेकिन वही गाली घर के बड़ों के झगड़े में सुनाई देती है।
टीवी, सिनेमा और सोशल मीडिया में गालियाँ खुलेआम प्रयोग होती हैं, और लोग इन्हें ‘रियलिस्टिक’ या ‘बोल्ड’ कहकर स्वीकार करते हैं।
कामगार वर्ग से लेकर पढ़े-लिखे तबके तक, गाली हर जगह है—बस मंच और सन्दर्भ अलग-अलग हैं।
यानी सच यह है कि गाली हमारी संस्कृति से गहराई से जुड़ी है। लेकिन जब वही भाषा राजनीति में गूँजती है, तो यह अचानक ‘सभ्यता की हत्या’ और ‘देश की इज़्ज़त का सवाल’ बना दी जाती है।
राजनीति में गाली का नाटकीय उपयोग
राजनीति में गाली कोई नया हथियार नहीं है।
आज़ादी के बाद से ही विरोधियों को नीचा दिखाने के लिए तीखी और अभद्र भाषा का इस्तेमाल होता आया है।
चुनावी रैलियों में, बंद दरवाज़ों के पीछे बैठकों में, और यहाँ तक कि संसदीय बहसों में भी नेताओं की ज़ुबान फिसली है।
लेकिन फर्क तब पड़ता है जब मीडिया कैमरे में वह शब्द कैद हो जाए और प्रचार की मशाल पकड़ ले।
आज स्थिति यह है कि गाली एक तरह का भावनात्मक ड्रामा बन चुकी है।
इसे जनता की भावनाएँ भड़काने के लिए दिखाया जाता है।
‘हमारे नेता का अपमान हुआ है, अब जनता को जवाब देना होगा’—इस नैरेटिव से असल मुद्दे गायब कर दिए जाते हैं।
बेरोज़गारी, महँगाई, शिक्षा, स्वास्थ्य और भ्रष्टाचार जैसे गंभीर विषय, जिन पर जवाबदेही होनी चाहिए, गाली के शोर में कहीं दब जाते हैं।
राजनीतिक पार्टियाँ जानती हैं कि भावनात्मक मुद्दे, तर्कसंगत सवालों की तुलना में ज़्यादा असर डालते हैं। इसलिए गाली को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाना आसान और फायदेमंद होता है।
क्या गाली वाकई ‘संस्कृति का संकट’ है?
अगर गहराई से देखें, तो गाली हमारे समाज की परंपरा में भी कहीं-न-कहीं दर्ज है।
कबीर ने भी तीखे और कटु शब्दों का इस्तेमाल किया।
ग्रामीण लोकगीतों में गालियाँ खुले रूप में गाई जाती हैं।
शहरी युवाओं की ‘स्लैंग कल्चर’ गालियों से भरी हुई है।
तो क्या वाकई यह संस्कृति पर हमला है? या यह केवल चयनात्मक नैतिकता है—जहाँ आम लोगों की गाली को ‘ठीक’ माना जाता है और नेताओं की गाली को ‘महापाप’?
असल में, यह एक नाटक है। जनता की भावनाओं को हिलाने का तरीका है। जब तक लोग गाली की बहस में उलझे रहेंगे, वे यह नहीं पूछेंगे कि उनके गाँव में सड़क क्यों टूटी है, अस्पताल में दवा क्यों नहीं है, और नौजवानों को नौकरी क्यों नहीं मिल रही।
आँकड़े: असली मुद्दे कहाँ हैं?
बेरोज़गारी
जुलाई 2025 में भारत की बेरोज़गारी दर 5.2% रही, जो जून के 5.6% से थोड़ी कम थी। सरकार का कहना है कि स्थिति सुधर रही है, लेकिन स्वतंत्र एजेंसी CMIE का अनुमान है कि वास्तविक बेरोज़गारी 7% तक हो सकती है। इसका मतलब है कि हर बीस में से एक युवा काम की तलाश में है लेकिन नौकरी नहीं मिल रही।
महँगाई
जुलाई 2025 में खुदरा महँगाई दर (CPI) घटकर 1.55% हो गई—आठ साल का न्यूनतम स्तर। पहली नज़र में यह राहत लगती है, लेकिन इसमें बड़ा कारण है खाद्य महँगाई का –1.76% पर जाना। यानी दाल, सब्ज़ियाँ और अनाज जैसी चीज़ों की कीमतें गिरीं, पर किसानों की आमदनी भी सिकुड़ गई। शहरी महँगाई 2.05% और ग्रामीण 1.18% रही।
आर्थिक संदर्भ
GDP वृद्धि दर भी अप्रैल-जून 2025 तिमाही में घटकर 6.7% पर आ गई है, जो पिछली तिमाही के 7.4% से कम है। अमेरिका द्वारा लगाए गए नए टैरिफ़ और वैश्विक अनिश्चितताओं का असर भी साफ़ दिख रहा है।
जनता और असली मुद्दे
आज देश की सबसे बड़ी चुनौती है—
करोड़ों बेरोज़गार युवा,
शिक्षा और स्वास्थ्य की बदहाल स्थिति,
किसानों की आय में गिरावट,
बढ़ती सामाजिक असमानताएँ।
लेकिन इन सवालों पर जनता की ऊर्जा लगाने के बजाय, राजनीति और मीडिया गाली को राष्ट्रव्यापी बहस बना देते हैं। गाली के शब्दों पर प्राइम टाइम होता है, लेकिन आँकड़ों और नीतियों पर सन्नाटा।
यह एक तरह की जनता से धोखाधड़ी है। लोगों का ध्यान भटकाना और भावनात्मक मुद्दों में उलझाकर असली सवालों को किनारे करना।
गाली से परे देखना होगा
यह मानना होगा कि गाली देना न तो कोई असाधारण अपराध है, न ही कोई राष्ट्रीय संकट। यह मानवीय कमजोरी है, भाषा का असभ्य हिस्सा है, लेकिन जीवन का हिस्सा भी है। हर तबके का इंसान इसे बोलता है—कभी सामने, कभी पीठ पीछे।
राजनीति का काम इसे नाटक बनाना नहीं, बल्कि जनता की समस्याओं का समाधान करना है।
अगर कोई नेता गाली देता है, तो उसे केवल उतना ही महत्व मिलना चाहिए जितना किसी भी असभ्य शब्द को मिलता है—न अधिक, न कम।
लेकिन जब गाली को हथियार बनाकर जनता की भावनाओं से खेला जाता है, तब असली नुक़सान लोकतंत्र का होता है।
बिहार में हुआ ताज़ा गाली-कांड हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि हम अपने समाज और राजनीति में किन मुद्दों को प्राथमिकता देते हैं। गाली पर भावनात्मक नाटक करके हम केवल अपने असली सवालों से दूर हो रहे हैं।
सच तो यह है कि गाली देना इंसान की कमजोरी है, लेकिन इसे राजनीति का मुख्य विषय बनाना लोकतंत्र की और भी बड़ी कमजोरी है। जब तक जनता इस खेल को समझेगी नहीं, तब तक असली समस्याएँ—रोज़गार, शिक्षा, स्वास्थ्य, और समान अवसर—गाली के शोर में दबती रहेंगी।
हमें यह तय करना होगा कि हम गाली के नारे में बहेंगे या असली मुद्दों पर अडिग खड़े होंगे। लोकतंत्र की असली मज़बूती इसी में है।
Ankit Awasthi









