✒️अंकित अवस्थी
भारत में जब भी शिक्षा की बात होती है, तो सबसे पहले उम्मीदों का बोझ सामने आ जाता है। यह बोझ सिर्फ छात्रों पर नहीं, बल्कि अभिभावकों, शिक्षकों और पूरे समाज पर होता है। शायद इसलिए हर साल जब NIRF (नेशनल इंस्टीट्यूशनल रैंकिंग फ्रेमवर्क) की नई सूची आती है, तो उसमें शामिल संस्थानों को देखकर गर्व भी होता है और बाकी तस्वीर देखकर चिंता भी।
NIRF 2025 की घोषणा ने एक बार फिर हमें यही आईना दिखाया है।
इस बार भी IIT मद्रास ने ‘ओवरऑल’ श्रेणी में पहला स्थान हासिल किया है। यह लगातार बारहवीं बार है जब उसने शीर्ष पर अपनी पकड़ बनाए रखी है। विज्ञान और शोध की दुनिया में IISc बेंगलुरु ने अपना दबदबा कायम रखा है। दिल्ली यूनिवर्सिटी के हिंदू कॉलेज, मिरांडा हाउस और हंसराज कॉलेज ने कॉलेज श्रेणी में अव्वल स्थान पाया है। और चिकित्सा के क्षेत्र में AIIMS दिल्ली की स्थिति अडिग रही।
नई बात यह है कि इस साल से SDG (सस्टेनेबल डेवलपमेंट गोल्स) श्रेणी भी शुरू की गई, जिसमें भी IIT मद्रास ने बाज़ी मारी। यह सिर्फ एक रैंकिंग नहीं, बल्कि यह संकेत है कि शिक्षा अब केवल प्रयोगशाला या कक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि समाज और पर्यावरण की जिम्मेदारियों से भी सीधे जुड़ रही है।
भारत बनाम चीन: बजट और वास्तविकता
जब हम इन उपलब्धियों पर गर्व करते हैं, तो तुलना का सवाल भी उठता है।
भारत ने वित्त वर्ष 2025 में अपनी GDP का लगभग 4.6% शिक्षा पर खर्च किया।
इसके मुकाबले चीन लगभग 6.1%, अमेरिका 6% और जापान 7.4% तक निवेश कर रहे हैं।
सोचिए, अगर हम शिक्षा पर संसाधन चीन जितना भी खर्च करें, तो क्या हमारे संस्थान केवल एशिया ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया में शीर्ष पर नहीं पहुंचेंगे? आज भी QS और Times Higher Education जैसी वैश्विक रैंकिंग में भारतीय संस्थान सीमित संख्या में शामिल हो पाते हैं। जबकि चीन की कई यूनिवर्सिटियाँ लगातार शीर्ष 100 में जगह बना रही हैं।
यहाँ एक छात्र का दर्द समझिए। लखनऊ के एक सरकारी स्कूल में पढ़ने वाला अनिल रोज़ सुबह पाँच बजे उठता है, क्योंकि घर पर पढ़ाई की जगह नहीं है। उसकी माँ घरेलू कामगार है और पिता दिहाड़ी मज़दूर। अनिल का सपना है कि वह IIT जाए। वह अपनी टूटी मेज़ पर बैठकर, borrowed किताबों से पढ़ता है।
इसी देश में एक और तस्वीर है—दक्षिण दिल्ली का एक कोचिंग हब, जहाँ लाखों रुपये की फीस देकर छात्र वही सपना खरीदते हैं जो अनिल मुफ़्त की किताबों से पूरा करने की कोशिश करता है।
जब हम कहते हैं कि भारत का शिक्षा बजट वैश्विक औसत से कम है, तो यह सिर्फ आंकड़ों की कहानी नहीं, बल्कि अनिल जैसे लाखों बच्चों की अधूरी संभावनाओं की कहानी है।
गुणवत्ता बनाम पहुंच
NIRF रैंकिंग में दिख रही चमक हमें यह बताती है कि हमारे पास गुणवत्ता वाले संस्थान हैं। लेकिन पहुंच (access) अभी भी बहुत सीमित है। IIT, IIM या AIIMS में दाख़िला लेना किसी ‘भाग्य’ की तरह माना जाता है। लाखों में कुछ सौ छात्र ही प्रवेश पा पाते हैं। बाकी? वे या तो साधारण कॉलेजों में दाख़िला लेते हैं, या बेरोज़गारी के दलदल में धकेल दिए जाते हैं।
चीन ने यही अंतर समझा और पिछले दो दशकों में अपनी यूनिवर्सिटी नेटवर्क को गाँव-गाँव तक फैलाया। वहाँ शिक्षा अब सिर्फ अभिजात वर्ग की संपत्ति नहीं, बल्कि सामूहिक निवेश बन चुकी है।
शिक्षा सिर्फ डिग्री नहीं, दृष्टि है
आज शिक्षक दिवस के अवसर पर हमें यह याद करना चाहिए कि शिक्षा का असली अर्थ डिग्री या रैंकिंग नहीं है। शिक्षा हमें दुनिया को देखने की नई दृष्टि देती है।
मुझे याद है, एक बार एक छोटे कस्बे के शिक्षक ने अपने छात्रों से कहा था — “तुम्हें सिर्फ परीक्षा पास करने के लिए नहीं पढ़ना है। तुम्हें पढ़ना है ताकि तुम सवाल पूछ सको — क्यों? कैसे? और किसलिए?”
यही असली शिक्षा है।
रैंकिंग हमें प्रेरित करती है, बजट हमें सीमाएँ दिखाता है, लेकिन समाज की दिशा बदलने का काम तब होता है जब शिक्षा हमारे भीतर से सवाल जगाती है।
आने वाली पीढ़ी के नाम
शिक्षक दिवस पर जब हम अपने गुरुओं को नमन करते हैं, तो यह सिर्फ उनके योगदान का सम्मान नहीं, बल्कि एक वचन भी है — कि हम उनके दिए ज्ञान को आगे बढ़ाएँगे।
लेकिन एक चेतावनी भी जरूरी है।
अगर अगली पीढ़ी केवल “शिक्षा रत्न” बनने तक सीमित रह गई — यानी केवल मेडल, रैंक या सर्टिफिकेट की दौड़ में उलझी रही — तो समाज वहीं का वहीं रह जाएगा। असली ज़रूरत है कि हर युवा कुछ नया सीखे, प्रयोग करे, असफल हो, और फिर दोबारा कोशिश करे।
शिक्षा का अर्थ है लगातार सीखना। यह कभी ख़त्म नहीं होती। यह केवल स्कूल या कॉलेज तक सीमित नहीं रहती। यह खेतों में, कारखानों में, कंप्यूटर स्क्रीन पर, और यहाँ तक कि असफलताओं में भी छिपी होती है।
NIRF 2025 हमें बताता है कि भारत में प्रतिभा की कमी नहीं है।
लेकिन यह भी याद दिलाता है कि संसाधनों और दृष्टि के बिना हम वैश्विक दौड़ में पीछे छूट सकते हैं।
आज ज़रूरत है कि सरकार और समाज मिलकर शिक्षा को सबसे बड़ा निवेश मानें—क्योंकि यही निवेश हमें भविष्य में आत्मनिर्भर और सशक्त बनाएगा।
और अंत में, इस शिक्षक दिवस पर हम सब मिलकर एक संकल्प लें—
हम “शिक्षा रत्न” नहीं बनेंगे,
बल्कि “शिक्षा साधक” बनेंगे।
हम डिग्री या रैंक के पीछे नहीं, बल्कि ज्ञान की खोज में चलेंगे।
और उसी खोज से अपने और समाज के विकास का नया अध्याय लिखेंगे।









