भाजपा – उम्मीद, आशा, उपलब्धियां और सुलगते सवाल ? तीन लगातार कार्यकालों के बाद अब यह सवाल टालना मुश्किल है कि क्या केंद्र सरकार अपने बड़े वादों—“अच्छे दिन”, “सबका साथ-सबका विकास”, “न्यू इंडिया”—को जमीन पर उतार पाई है, या फिर यह यात्रा बड़े फैसलों, आक्रामक प्रचार और अधूरी डिलीवरी के बीच अटक कर रह गई है। एक सख्त ऑडिट की नजर से देखें तो तस्वीर एकतरफा नहीं, बल्कि कई परतों में बंटी हुई है—जहां उपलब्धियां हैं, वहीं गंभीर चूक भी हैं जिन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
1. नोटबंदी: झटका बड़ा, फायदा संदिग्ध
2016 की नोटबंदी को सरकार ने काले धन, नकली नोट और आतंक फंडिंग पर चोट के तौर पर पेश किया था। लेकिन बाद के आंकड़े बताते हैं कि लगभग पूरा पैसा बैंकिंग सिस्टम में वापस लौट आया।
- छोटे कारोबार और अनौपचारिक क्षेत्र (informal sector) को सबसे ज्यादा नुकसान हुआ
- लाखों मजदूरों की नौकरियां अस्थायी रूप से खत्म हुईं
- कैशलेस इकोनॉमी का लक्ष्य कुछ हद तक बढ़ा, लेकिन नकदी का उपयोग फिर सामान्य स्तर पर लौट आया
इतना बड़ा आर्थिक प्रयोग, लेकिन उसके घोषित उद्देश्यों के ठोस परिणाम अस्पष्ट—नीतिगत जोखिम का बड़ा उदाहरण।
2. कोविड काल: प्रबंधन बनाम मानवीय संकट
2020–21 का कोविड काल सरकार के लिए सबसे बड़ी परीक्षा था। शुरुआती लॉकडाउन ने संक्रमण की रफ्तार को कुछ समय के लिए रोका, लेकिन दूसरी लहर में स्वास्थ्य व्यवस्था की सीमाएं खुलकर सामने आईं।
- ऑक्सीजन सिलेंडर और बेड की भारी कमी—लोग अस्पतालों के बाहर दम तोड़ते दिखे
- श्मशानों और कब्रिस्तानों की तस्वीरों ने पूरे सिस्टम की तैयारी पर सवाल खड़े किए
- प्रवासी मजदूरों का पलायन—लाखों लोग पैदल सड़कों पर
सरकार ने बाद में वैक्सीनेशन ड्राइव को तेज कर स्थिति संभाली, जो एक बड़ी उपलब्धि रही।
संकट प्रबंधन में शुरुआत कमजोर, सुधार बाद में—लेकिन जो मानवीय कीमत चुकानी पड़ी, वह इस ऑडिट का सबसे कठोर हिस्सा है।
3. आर्थिक प्रदर्शन: चमकती तस्वीर, धुंधली जमीन
सरकार ने इंफ्रास्ट्रक्चर, डिजिटल पेमेंट्स और विदेशी निवेश के मोर्चे पर उल्लेखनीय काम किया है। भारत दुनिया की तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में बना हुआ है।
लेकिन दूसरी तरफ—
- बेरोजगारी एक स्थायी समस्या बनी हुई है
- युवाओं में “जॉब सिक्योरिटी” को लेकर अनिश्चितता
- छोटे व्यापारियों और MSME सेक्टर पर दबाव
ऊपर से अर्थव्यवस्था मजबूत दिखती है, लेकिन नीचे की परतों में असमानता और असुरक्षा बनी हुई है।
4. जनकल्याण योजनाएँ: पहुंच बड़ी, समाधान अधूरा
मुफ्त राशन, उज्ज्वला, DBT जैसी योजनाओं ने करोड़ों लोगों को राहत दी है। इसमें कोई संदेह नहीं कि सरकार ने “डिलीवरी सिस्टम” को मजबूत किया है।
लेकिन सवाल यह है—
क्या ये योजनाएं लोगों को स्थायी रूप से आत्मनिर्भर बना पा रही हैं?
या फिर वे केवल “सहारा” बनकर रह गई हैं?
सरकार ने राहत दी, लेकिन सशक्तिकरण (empowerment) अभी अधूरा है।
5. लोकतांत्रिक संवाद और जवाबदेही: सबसे बड़ा अंतर
तीन कार्यकालों में एक चीज जो लगातार सवालों में रही, वह है जनप्रतिनिधियों तक आम आदमी की पहुंच।
- जन सुनवाई और स्थानीय स्तर पर जवाबदेही की प्रक्रिया उतनी सरल नहीं हो पाई
- विपक्ष का आरोप—एजेंसियों का दुरुपयोग, संवाद की कमी
- सत्ता का केंद्रीकरण—निर्णय तेजी से होते हैं, लेकिन चर्चा सीमित
प्रभावी शासन और लोकतांत्रिक संवाद के बीच संतुलन कमजोर पड़ा है।
6. विपक्ष की आलोचनाएँ: कितनी सही, कितनी राजनीतिक?
विपक्ष ने सरकार पर कई मुद्दों पर तीखे सवाल उठाए—
- नोटबंदी की असफलता
- कोविड में लापरवाही
- बेरोजगारी और महंगाई
- संस्थाओं की स्वतंत्रता
इनमें कुछ आलोचनाएं राजनीतिक हो सकती हैं, लेकिन कई बिंदु ऐसे हैं जिन पर डेटा और घटनाएं खुद सवाल खड़े करती हैं।
7. तीन कार्यकालों की तुलना
- पहला कार्यकाल (2014–19): उम्मीद और संरचना निर्माण
- दूसरा कार्यकाल (2019–24): बड़े फैसले + बड़े विवाद
- तीसरा कार्यकाल (2024–अब): स्थिरता, लेकिन जनता की अपेक्षाओं का दबाव
👉 सबसे बड़ा सवाल:
क्या सरकार अब भी उसी ऊर्जा और जवाबदेही के साथ काम कर रही है, जिसके वादे के साथ वह सत्ता में आई थी?
अधूरी यात्रा, बढ़ती जिम्मेदारी
तीन कार्यकालों के बाद सरकार के पास बहाने कम और जिम्मेदारी ज्यादा है। इंफ्रास्ट्रक्चर, डिजिटल सिस्टम और वैश्विक छवि में सुधार हुआ है—यह इसका मजबूत पक्ष है।
लेकिन नोटबंदी जैसे फैसलों का असर, कोविड में दिखी कमियां, रोजगार और जनसुनवाई की समस्याएं यह बताती हैं कि नीतियों और नागरिक के अनुभव के बीच अब भी एक बड़ा गैप मौजूद है।
लखनऊ से आई रिपोर्ट में शोर को लेकर चौकाने वाला खुलासा !
अगर यह कार्यकाल सच में निर्णायक बनना है, तो सरकार को प्रचार से ज्यादा जमीनी सुधार, पारदर्शिता और जवाबदेही पर ध्यान देना होगा।
झालमुड़ी, राजनीति और ‘नैरेटिव’
क्योंकि अंत में जनता यह नहीं देखती कि कितने वादे किए गए—वह यह देखती है कि उसकी जिंदगी कितनी बदली। और यही इस ऑडिट का सबसे सख्त, लेकिन सबसे जरूरी पैमाना है।






