पिघलते पहाड़, सूखता भविष्य: जलवायु परिवर्तन विशेष दुनिया आज जिस गर्मी और असामान्य मौसम का सामना कर रही है, उसका असर अब सिर्फ मैदानों तक सीमित नहीं रहा। पहाड़—जिन्हें हम स्थिर, ठंडे और सुरक्षित मानते थे—वो भी तेजी से बदल रहे हैं। हिंदूकुश-हिमालय जैसी विशाल पर्वत श्रृंखलाएं, जो अरबों लोगों के जीवन का आधार हैं, अब जलवायु परिवर्तन के दबाव में कमजोर पड़ती दिख रही हैं।
पर्वतीय क्षेत्र पृथ्वी की सतह के लगभग 20% हिस्से में फैले हैं, लेकिन इनका महत्व इससे कहीं ज्यादा है। ये न केवल दुनिया की करीब 10% आबादी का घर हैं, बल्कि आधी से ज्यादा आबादी को पानी, खेती और आजीविका के लिए संसाधन भी उपलब्ध कराते हैं। गंगा, यमुना जैसी नदियां इन्हीं ग्लेशियरों से जन्म लेती हैं और करोड़ों लोगों की प्यास बुझाती हैं। इसलिए पहाड़ों को “वॉटर टॉवर” कहा जाना बिल्कुल सटीक है।
लेकिन पिछले कुछ दशकों में तस्वीर तेजी से बदली है। बढ़ते तापमान, जंगलों की कटाई, अनियंत्रित पर्यटन और प्राकृतिक संसाधनों के अत्यधिक दोहन ने इन क्षेत्रों के संतुलन को बिगाड़ दिया है। पहले जहां बर्फ गिरने के बाद ग्लेशियरों का दायरा बढ़ता था, अब वह लगातार सिमट रहा है। वैज्ञानिक आंकड़े बताते हैं कि हिमालयी ग्लेशियर हर दशक में औसतन 30 से 60 मीटर तक पीछे हट रहे हैं।
उत्तराखंड का गंगोत्री ग्लेशियर इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। यह ग्लेशियर, जो गंगा का मुख्य स्रोत है, हर साल करीब 28-30 मीटर की रफ्तार से पीछे खिसक रहा है। पिछले लगभग 90 सालों में यह 1.5 किलोमीटर से ज्यादा सिमट चुका है। चिंताजनक बात यह है कि हाल के वर्षों में इसके पिघलने की गति और तेज हो गई है।
इस बदलाव का असर सिर्फ पहाड़ों तक सीमित नहीं रहेगा। हिंदूकुश-हिमालय क्षेत्र में भारत, नेपाल, पाकिस्तान और भूटान जैसे देशों की बड़ी आबादी रहती है, जो सीधे तौर पर इन जल स्रोतों पर निर्भर है। अगर ग्लेशियर इसी तरह पिघलते रहे, तो सदी के अंत तक यहां की 70-75% बर्फ खत्म होने का खतरा है। इसका मतलब होगा—पानी की भारी कमी, खेती पर संकट और करोड़ों लोगों की आजीविका पर सीधा असर।
नेपाल जैसे देशों में इसके संकेत पहले ही दिखने लगे हैं। वहां अनियमित मानसून, बार-बार आने वाली बाढ़ और भूस्खलन, सूखते जल स्रोत और घटता कृषि उत्पादन—ये सब जलवायु परिवर्तन के स्पष्ट संकेत हैं। जैव विविधता भी तेजी से प्रभावित हो रही है, जिससे स्थानीय समुदायों का जीवन और कठिन होता जा रहा है।
वैज्ञानिक संस्थान लगातार चेतावनी दे रहे हैं कि अगर वैश्विक तापमान को 1.5 डिग्री सेल्सियस के भीतर नहीं रोका गया, तो हिमालय के अधिकांश ग्लेशियर इस सदी के अंत तक खत्म हो सकते हैं। इसका असर सिर्फ एशिया ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया पर पड़ेगा, क्योंकि ये क्षेत्र वैश्विक जलवायु संतुलन में अहम भूमिका निभाते हैं।
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समस्या जितनी बड़ी है, समाधान उतना ही जरूरी है। औद्योगिक उत्सर्जन को नियंत्रित करना, जंगलों को बचाना और पर्वतीय क्षेत्रों में अनियंत्रित पर्यटन पर लगाम लगाना अब विकल्प नहीं, बल्कि आवश्यकता बन चुके हैं। इसके साथ ही पारंपरिक ज्ञान को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। पहाड़ी इलाकों में पहले लोग बारिश के पानी को रोककर, उसे जमाकर और सुरक्षित रखकर साल भर इस्तेमाल करते थे—आज इसे “स्नो हार्वेस्टिंग” के रूप में फिर से समझा जा रहा है।
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असल सवाल यही है कि क्या हम समय रहते चेतेंगे? क्योंकि पहाड़ों का पिघलना सिर्फ बर्फ का खत्म होना नहीं है, यह हमारे भविष्य का धीरे-धीरे बह जाना है।








