राष्ट्रीय संगोष्ठी- भक्ति आंदोलन, लोक जागरण और डॉ. रामविलास शर्मा का चिंतन

लोक जागरण की अवधारणा सबसे पहले डॉ शर्मा ने प्रस्तुत की थी’ भावी इतिहास में डॉ शर्मा पर फोकस होगा-प्रो.रमाशंकर महिला कवियों की उपेक्षा पर विद्वानों में मतभेद उभरे उन्नाव। डॉ रामविलास शर्मा का दृष्टिकोण यह स्थापित करता है कि भक्ति साहित्य भारतीय समाज का लोकतांत्रिक, जनमुखी और सांस्कृतिक पुनर्जागरणकारी साहित्य है। इसने न केवल मध्यकालीन भारत की आत्मा को स्पर्श किया बल्कि आधुनिक भारत की सामूहिक चेतना को भी आकार दिया। यह सार ‘भक्ति आंदोलन, लोक जागरण और डॉ रामविलास शर्मा का चिंतन’ विषयक संगोष्ठी में उभर कर आया।

मुख्य अतिथि प्रो.अवधेश प्रधान ने कहा कि वस्तुत: धर्म के सार को भक्तिकाल ने प्रस्तुत किया गया। डॉ रामविलास शर्मा के साहित्य के स्मरण प्रस्तुत करते हुए कहा कि उनका पहला लेख 1934 में छपा था। उनकी विद्वता पर बोलते हुए प्रो अवधेश ने कहा की डॉ शर्मा लखनऊ विवि के पहले अंग्रेजी से पीएचडी थे। उन्होंने डॉ शंकर दयाल शर्मा को फ्रेंच पढ़ाया था। अपने युग सबसे बड़े कर्मयोगी थे। उन्होंने जीवन भर लिखा। लेखन की तपस्या की। 1857 पर कार्लमार्क्स ऐंगल्स की किताब आने से पहले डॉ रामविलास शर्मा की किताब 1857 पर आ गयी थी। हिंदीभाषियों को अधिक से अधिक सचेत बनाने के लिए उन्होंने इतिहास विषय पर लिखा। भारत की औपनिवेशिक तस्वीर के दौर में इतिहास भ्रमित करने वाला था।

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उर्दू भारत की भाषा है पाकिस्तान की नहीं। उन्होंने कहा कि डॉ. रामविलास शर्मा ने भक्ति आंदोलन को जनता, भाषा और संस्कृति के जमीनी संघर्ष का रूप माना। उनका चिंतन इस आंदोलन को आध्यात्मिक नहीं, बल्कि लोकजागरण और सामाजिक परिवर्तन की शक्ति के रूप में देखने की दिशा प्रदान करता है। भक्ति आंदोलन को केवल धार्मिक प्रवृत्ति के रूप में नहीं, बल्कि भारतीय समाज की लोकतांत्रिक चेतना के उद्भव के रूप में देखा। वरिष्ठ पत्रकार सुभाष राय ने महिला कवियों पर डॉ शर्मा के लेखन को विस्तार से बताया। भक्ति कवियों की रचनाएँ उस काल की सामाजिक विडंबनाओं के विरुद्ध उठी आवाज़ थीं जहाँ जाति, पाखंड, सामंती दमन और सांप्रदायिक तनावों से त्रस्त जनता ने संतों की वाणी में अपनी मुक्ति का मार्ग खोजा।
डॉ पुष्प बरनवाल ने महिला कवियों पर कम लिखा जाने का संदर्भ लेते हुए व्याख्यान दिया। प्रो रमेश दीक्षित ने कहा कि कबीर, तुलसी, रैदास, मीरा और सूर ने लोकभाषाओं में लिखकर साहित्य को जनता के हाथों में दे दिया। इससे भक्ति आंदोलन एक विस्तृत लोक जागरण में परिवर्तित हुआ, जिसने न केवल सांस्कृतिक एकता को मजबूत किया बल्कि सामाजिक नैतिकता और मनुष्यता को नए आयाम दिए। प्रो रमाशंकर ने कहा कि हिंदी पट्टी ने डॉ रामविलास शर्मा को भुला दिया है। वह इतिहास लेखन में डॉ शर्मा पर फोकस रखेंगे।

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अन्य वक्ताओं ने कहा कि डॉ. शर्मा के चिंतन की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि उन्होंने भक्ति आंदोलन को भारतीय समाज में परिवर्तन की ऐतिहासिक प्रक्रिया के रूप में समझा। उनके लिए यह आंदोलन विगत और वर्तमान को जोड़ने वाली सामाजिक कड़ी था जहाँ अध्यात्म के माध्यम से जन-संघर्ष, समानता और नैतिक चेतना को शक्ति मिली। संगोष्ठी की अध्यक्षता प्रो रमेश दीक्षित ने की तथा संचालन दिनेश प्रियमन ने किया। प्रो अवधेश प्रधान को डॉ. रामविलास शर्मा सृजन सम्मान- 2025 से सम्मानित किया गया। विषय प्रवर्तन डॉ रामनरेश ने किया। मुख्यवक्ता का परिचय प्रो.आंनद शुक्ला ने दिया। वरिष्ठ पत्रकार महेश शर्मा ने अपनी पुष्तक ‘रफनोट्स’ की प्रतियां अतिथियों को भेंट की। इस अवसर पर एडवोकेट सईद नकवी, राजेश अरोड़ा, अनीता मिश्रा, अखिलेश कुमार आदि लोग उपस्थित थे।

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  • Ankit Awasthi

    Consulting Editor

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