उन्नाव। उत्तर प्रदेश के उन्नाव जनपद अंतर्गत सफीपुर तहसील क्षेत्र से किसानों की कमर तोड़ने वाली एक दुखद खबर सामने आई है। यहाँ शारदा नहर से निकली बारीथाना माइनर दो अलग-अलग स्थानों पर अचानक कट गई, जिससे अमानखेड़ा गांव के आसपास के खेतों में सैलाब आ गया। लखनऊ-बांगरमऊ मार्ग के समीप स्थित पचासों बीघा गेहूं और सरसों की लहलहाती फसलें अब पानी के नीचे समा गई हैं। इस घटना ने जहाँ सिंचाई विभाग की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं, वहीं खून-पसीने से सींची गई फसल की बर्बादी देख किसानों की आंखों में आंसू हैं।
रात भर खेतों में बहता रहा पानी, सुबह मची चीख-पुकार
जानकारी के अनुसार, अमानखेड़ा गांव के समीप से गुजरने वाली बारीथाना माइनर में जैसे ही सिंचाई के लिए पानी का रोस्टर शुरू हुआ, माइनर के कमजोर तटबंध पानी का दबाव नहीं झेल सके। देखते ही देखते दो स्थानों पर गहरी ‘खांदी’ कट गई और तेज बहाव के साथ पानी किसानों के खेतों की ओर मुड़ गया। जब सुबह किसान अपने खेतों पर पहुंचे, तो नजारा देख उनके पैरों तले जमीन खिसक गई। गेहूं के हरे-भरे पौधे और सरसों की पीली चादर अब गंदे पानी के बीच डूबी हुई थी।
इन किसानों के सपनों पर फिरा पानी
इस प्राकृतिक आपदा कम और ‘विभागीय लापरवाही’ ज्यादा मानी जा रही इस घटना ने दर्जनों परिवारों के सामने आर्थिक संकट खड़ा कर दिया है। प्रभावित किसानों में मुख्य रूप से सुधीर सिंह, सतेंद्र सिंह, श्यामलाल, कन्हई, रामचंद्र, मेवालाल, उर्मिला देवी, आशा सिंह, विशंभर, विजय कुमार सिंह, रमेश सिंह, देव कुमारी, सरोजनी और नन्हके गुप्ता शामिल हैं। किसानों का कहना है कि उन्होंने कर्ज लेकर और अपनी पूरी जमापूंजी लगाकर फसल बोई थी, लेकिन अब फसल के सड़ने का डर उन्हें सता रहा है।
किसानों का गंभीर आरोप: “सफाई के नाम पर हुई केवल खानापूर्ति”
पीड़ित किसानों ने सिंचाई विभाग के अधिकारियों और ठेकेदारों पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगाए हैं। ग्रामीणों का कहना है कि करीब 20 दिन पहले इस माइनर की सफाई का काम कागजों पर पूरा दिखाया गया था।
गाद और खरपतवार की समस्या: किसानों का आरोप है कि सफाई के नाम पर केवल किनारों से घास छीली गई, जबकि माइनर के भीतर जमी गाद (Silt) और खरपतवार को नहीं निकाला गया। इसके चलते पानी का स्तर ऊपर आ गया और कमजोर तटबंध टूट गए।
दोहरी मार: अमानखेड़ा के पास स्थित एक पुरानी पुलिया निकासी के लिए छोटी पड़ती है। जब पानी का बहाव तेज होता है, तो पुलिया के पास ‘बैक वॉटर’ प्रेशर बनता है, जिससे माइनर के कटने की संभावना बढ़ जाती है। किसानों ने इसकी शिकायत पहले भी की थी, लेकिन विभाग कुंभकर्णी नींद सोया रहा।

सिंचाई विभाग का पक्ष: “जांच के बाद होगी कार्रवाई”
इस मामले में जब ‘ट्रुथ इंडिया टाइम्स’ ने सिंचाई विभाग के अधिशासी अभियंता (XEN) दीपक यादव से संपर्क किया, तो उन्होंने बताया कि माइनर कटने की सूचना मिलते ही मौके पर टीम को भेजा गया है। उन्होंने कहा, “माइनर किन परिस्थितियों में कटी, इसकी गहन जांच कराई जाएगी। यदि सफाई कार्य में किसी भी स्तर पर लापरवाही पाई गई, तो संबंधित कर्मियों और ठेकेदार के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी। फिलहाल पानी को रोकने और तटबंधों की मरम्मत का काम प्राथमिकता पर है।

गेहूं-सरसों को क्यों है ज्यादा खतरा?
कृषि विशेषज्ञों के अनुसार, गेहूं और सरसों की फसल को सिंचाई की आवश्यकता तो होती है, लेकिन खेत में लंबे समय तक जलभराव (Waterlogging) इन फसलों के लिए जहर के समान है।
सरसों: सरसों की फसल में पानी भरने से उसकी जड़ें गलने लगती हैं और फंगस लगने का डर बढ़ जाता है।
गेहूं: गेहूं की नई फसल अगर अधिक समय तक पानी में डूबी रहे, तो वह पीली पड़कर सूखने लगती है, जिससे पैदावार में भारी गिरावट आती है।
मुआवजे की मांग को लेकर अड़े किसान
प्रभावित किसानों ने जिला प्रशासन और सफीपुर तहसील प्रशासन से मांग की है कि लेखपाल और राजस्व टीम को मौके पर भेजकर हुए नुकसान का सटीक आकलन (सर्वे) कराया जाए। किसानों का कहना है कि उन्हें प्रति बीघा के हिसाब से उचित मुआवजा मिलना चाहिए, अन्यथा वे तहसील मुख्यालय पर प्रदर्शन करने को मजबूर होंगे।







