उत्तर प्रदेश में “वन्दे मातरम्” अनिवार्यता: पक्ष-विपक्ष एवं शिक्षा-महत्व

पक्ष में क्या कहा जा रहा है

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने हाल ही में यह घोषणा की है कि राज्य के सभी स्कूलों एवं शिक्षण संस्थानों में वन्दे मातरम् को अनिवार्य रूप से गाया जाएगा। उनका कहना है कि यह कदम बच्चों में देशभक्ति की भावना जागृत करेगा, राष्ट्रीय एकता को मजबूत करेगा और विद्यार्थियों में मातृभूमि-भावना विकसित करेगा। सरकार का तर्क है कि शिक्षा केवल गणित-भाषा तक सीमित नहीं रह सकती, बल्कि उसमें आत्म-स्मृति और नागरिक उत्तरदायित्व का भाव भी होना चाहिए।

विपक्ष में क्या चिंताएँ सामने आ रही हैं

इस निर्णय को लेकर समाज के कुछ हिस्से में विरोध भी देखने को मिल रहा है। मुस्लिम-समुदाय के धार्मिक नेताओं ने इसे अपनी धार्मिक आजादी एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की दृष्टि से चुनौती माना है, और पूछा है कि क्या किसी गीत को अनिवार्य बनाने से बच्चों की विविध पहचान का सम्मान होगा या नहीं। साथ ही यह भी प्रश्न उठ रहा है कि यदि यह सिर्फ वन्दे मातरम् होगा तो जन गण मन क्यों नहीं प्राथमिकता में रहा — क्या यह शिक्षा-नीति में पक्षपात नहीं दर्शाता?

“जन गण मन” क्यों नहीं?

भारतीय संविधान ने “जन गण मन” को राष्ट्रीय गान तथा “वन्दे मातरम्” को राष्ट्रगीत (या राष्ट्रीय गीत) के रूप में स्वीकार किया है। इस प्रकार दोनों का अलग स्थिति में होना तथ्य है। सरकार का तर्क है कि वन्दे मातरम् आजादी-संघर्ष की प्रेरणा रहा है और इसे विद्यालयों में अनिवार्य करना एक सांस्कृतिक अभिव्यक्ति है। हालांकि, इस बात पर चिंताएँ उठीं हैं कि यदि शिक्षा-स्थलों में केवल एक गीत को अनिवार्य किया जाए, तो विविधता, समावेशन और संवेदनशीलता कहाँ छूट जाए?

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शिक्षा-प्रसंग में प्रमुख टिपण्णी

इस पूरे विवाद को देखकर यह स्पष्ट हो जाता है कि बच्चों को अच्छी शिक्षा देना सबसे जरूरी है। स्कूलों में गीत-गायन तो एक रुचिकर गतिविधि हो सकती है, लेकिन शिक्षा-प्रणाली का मूल उद्देश्य बच्चों को सोचने, समझने और चुनने की क्षमता देना है।
अतः:

  • हमें सुनिश्चित करना चाहिए कि गीत या अनुष्ठान बच्चों की शैक्षिक प्रगति के पहले न आएं।
  • विविध सांस्कृतिक-पृष्ठभूमि वाले बच्चों की पहचान का सम्मान हो।
  • बच्चों को नागरिकता, बहुलता, आलोचनात्मक चिंतन और सामाजिक जिम्मेदारी का पाठ पढ़ाया जाए।
  • सबसे महत्वपूर्ण: शिक्षक-शिक्षण, पाठ्यक्रम-गुणवत्ता और संसाधन-सुगमता पर विशेष ध्यान रखा जाए।

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न्यूज़ 80 टिपण्णी

वन्दे मातरम् को विद्यालयों में अनिवार्य करना सरकार का सांस्कृतिक-निर्देश है, जिसमें राष्ट्रीय एकता के भाव को बढ़ावा देना है। लेकिन शिक्षा-स्थल पर यह निर्णय सामाजिक-सार्वजनिक बहस एवं संवेदनाओं को भी उत्पन्न कर रहा है। ऐसी स्थिति में शिक्षा-नीति का उद्देश्य केवल प्रतीकात्‍मक प्रदर्शन नहीं बल्कि समग्र मानव विकास होना चाहिए। बच्चों को सिर्फ गीत गाने वाले नहीं बल्कि सोचने-विचारने वाले नागरिक बनना है। इसलिए, अगर इस निर्णय के साथ शिक्षा-गुणवत्ता, समावेशन और आलोचनात्मक भावना को भी जोड़ा जाए, तो वास्तव में बच्चों को अच्छी शिक्षा मिल सकती है — और यही सबसे अहम लक्ष्य होना चाहिए।

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