लगभग 15 वर्षों के शिक्षण कालखंड में मेरा अनुभव रहा है कि व्यक्तित्व का निर्माण केवल पुस्तकीय ज्ञान से नहीं बल्कि प्रतिबद्धता की दृढ़ अग्नि में तपकर निखरता है l प्रतिबद्धता वह आंतरिक शक्ति है जो व्यक्ति को लक्ष्य के प्रति अडिग बनाती है उसे असफलताओं से विचलित नहीं होने देती और उसके चरित्र को दृढ़ता प्रदान करती है l कक्षा कक्ष में जब मैं छात्रों को प्रेरित करता हूं तो उन्हें समझाता हूं प्रतिबद्धता का अर्थ है बिना बहानो के निरंतर प्रयास l राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का उदाहरण देते हुए उन्हें बताता हूं कि अहिंसा के प्रति उनकी अटल निष्ठा ने उन्हें विश्व पटल पर महान बना दिया l प्रतिबद्धता व्यक्तित्व के कई पहलुओं को विकसित करती है यह अनुशासन सिखाती है नियमित अध्ययन करने वाला छात्र समय प्रबंधन में कुशल बनता है l यह सहनशीलता बढ़ाती है परीक्षा में असफल होने पर भी प्रतिबद्ध छात्र हार नहीं मानता बल्कि और अधिक मेहनत करता है l वह नैतिकता का आधार बनती है l सामाजिक कार्यों में सक्रिय रहने से नेतृत्व और सहनभूति के गुण विकसित होते हैं l
मेरे अनुभव में जो छात्र-छात्राएं खेल संगीत और कला में प्रतिबद्ध रहते हैं वे आत्मविश्वास टीम वर्क और समर्पण जैसे गुणों से युक्त होते हैं l एक शिक्षक के रूप में मैं उन्हें छोटे लक्ष्य तय करने प्रगति डायरी रखने और समय-समय पर आत्म मूल्यांकन करने के लिए प्रेरित करता हूं l प्रतिबद्धता को बढ़ावा देने के लिए सकारात्मक मार्गदर्शन और प्रोत्साहन आवश्यक है परंतु अत्यधिक दबाव से बचना चाहिए यह छात्रों में विद्रोह की भावना उत्पन्न कर सकता है l
अंततः प्रतिबद्धता वह पूंजी है जो युवाओं को ना केवल सफल बनाती है बल्कि उन्हें समाज का जिम्मेदार नागरिक भी बनाती है l
आज सभी शिक्षकों का दायित्व है कि वे इस मूल्य को बच्चों रोपे और उसका पालन स्वयं भी करें l








