केवल पुस्तकीय ज्ञान से नहीं बल्कि प्रतिबद्धता की दृढ़ अग्नि में तपकर निखरता है व्यक्तित्व “- आचार्य प्रदीप द्विवेदी एम. ए. द्वय ( राजनीति विज्ञान, हिंदी) बी. पी. एड.शारीरिक आचार्य विद्या भारती

लगभग 15 वर्षों के शिक्षण कालखंड में मेरा अनुभव रहा है कि व्यक्तित्व का निर्माण केवल पुस्तकीय ज्ञान से नहीं बल्कि प्रतिबद्धता की दृढ़ अग्नि में तपकर निखरता है l प्रतिबद्धता वह आंतरिक शक्ति है जो व्यक्ति को लक्ष्य के प्रति अडिग बनाती है उसे असफलताओं से विचलित नहीं होने देती और उसके चरित्र को दृढ़ता प्रदान करती है l कक्षा कक्ष में जब मैं छात्रों को प्रेरित करता हूं तो उन्हें समझाता हूं प्रतिबद्धता का अर्थ है बिना बहानो के निरंतर प्रयास l राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का उदाहरण देते हुए उन्हें बताता हूं कि अहिंसा के प्रति उनकी अटल निष्ठा ने उन्हें विश्व पटल पर महान बना दिया l प्रतिबद्धता व्यक्तित्व के कई  पहलुओं को विकसित करती है यह अनुशासन सिखाती है नियमित अध्ययन करने वाला छात्र समय प्रबंधन में कुशल बनता है l यह सहनशीलता बढ़ाती है परीक्षा में असफल होने पर भी प्रतिबद्ध छात्र हार नहीं मानता बल्कि और अधिक मेहनत करता है l वह नैतिकता का आधार बनती है l सामाजिक कार्यों में सक्रिय रहने से नेतृत्व और सहनभूति के गुण विकसित होते हैं l
   मेरे अनुभव में जो छात्र-छात्राएं खेल संगीत और कला में प्रतिबद्ध रहते हैं वे आत्मविश्वास टीम वर्क और समर्पण जैसे गुणों से युक्त होते हैं l एक शिक्षक के रूप में मैं उन्हें छोटे लक्ष्य तय करने प्रगति डायरी रखने और समय-समय पर आत्म मूल्यांकन करने के लिए प्रेरित करता हूं l प्रतिबद्धता को बढ़ावा देने के लिए सकारात्मक मार्गदर्शन और प्रोत्साहन आवश्यक है परंतु अत्यधिक दबाव से बचना चाहिए यह छात्रों में विद्रोह की भावना उत्पन्न कर सकता है l
          अंततः प्रतिबद्धता वह पूंजी है जो युवाओं को ना केवल सफल बनाती है बल्कि उन्हें समाज का जिम्मेदार नागरिक भी बनाती है l
      आज सभी शिक्षकों का दायित्व है कि वे इस मूल्य  को बच्चों रोपे और उसका पालन स्वयं भी करें l

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  • Hari Om Gupta

    Editor In Chief - The News 80

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