मेटाफर लिट फेस्ट – लखनऊ का सबसे बड़ा साहित्यिक मंच हुआ गुलज़ार

मेटाफर लिट फेस्ट : मिलन वोहरा—लेखिका और TEDx वक्ता—ने अपनी साहित्यिक यात्रा की शुरुआत प्रेम-कथाओं से की। शुरुआती दौर में उनका विश्वास था कि प्रेम का अर्थ कोमलता और सौम्यता ही है। लेकिन जैसे-जैसे उनका लेखन परिपक्व हुआ, एक दूसरी सच्चाई सामने आने लगी—प्रेम की एक परछाईं भी होती है। टूटन, अधूरे जज़्बात, अनकहे शब्द और वे चुप्पियाँ जो भीतर तक हिला देती हैं।

जब भी कोई कहानी पूरी होती दिखती, वह बिखरकर टुकड़ों में बदल जाती—कुछ क्षण, कुछ नज़रें, कुछ मौन। उनके पात्र सरल नहीं थे; वे जटिलताओं से गढ़े गए थे—आत्ममुग्धता के संकेत, भावनात्मक अनुपस्थिति, और ऐसे घाव जिन्हें केवल कल्पना से नहीं, बल्कि गहन शोध और समझ से उकेरा गया।

भूगोल भी उनके लेखन में एक मौन पात्र बन गया। शहर भावनाओं को बदल देते हैं, दूरियाँ किस्मत की दिशा मोड़ देती हैं। बचपन से ही उनके भीतर अनगिनत कहानियाँ थीं, पर असली कला चयन में थी—ऐसी कथाएँ चुनने में जो सिर्फ मनोरंजन न करें, बल्कि भीतर तक उतर जाएँ। ऐसी कहानियाँ जो हर पाठक से, बिना अपवाद, संवाद कर सकें।

यह पुस्तक अनुभवों के सघन प्रवाह का सार है—जीवन से निचोड़ा गया अमृत। इसके केंद्र में एक विवादास्पद संबंध है—एक उम्रदराज़, विवाहित पुरुष के साथ—जहाँ नैतिक दुविधाएँ हैं, भावनात्मक परतें हैं और भीतर की परिपक्वता का विस्तार है। यह कहानी बढ़ने, समझने और बदलने की प्रक्रिया की ओर संकेत करती है—जहाँ प्रेम केवल भावना नहीं, बल्कि आत्म-बोध की यात्रा बन जाता है।

मेटाफ़र लखनऊ लिटरेचर फ़ेस्टिवल: मिर्ज़ा ग़ालिब—शब्दों से परे एक विरासत

14 दिसंबर 2025 को मेटाफ़र लखनऊ लिटरेचर फ़ेस्टिवल में उर्दू साहित्य की सबसे स्थायी और प्रभावशाली आवाज़ों में से एक, मिर्ज़ा ग़ालिब को समर्पित एक विशेष संध्या आयोजित की गई। यह सत्र ग़ालिब की कविता, उनकी वैचारिक गहराई और उनकी अमर उपस्थिति का उत्सव था—एक ऐसी विरासत जो समय के साथ और अधिक प्रासंगिक होती गई है।

इस अवसर पर साहित्यालोचक, अनुवादक, अंग्रेज़ी-उर्दू के द्विभाषी कवि और विद्वान प्रो. अनीसुर रहमान ने अपनी पुस्तक “The Essential Ghalib” के माध्यम से ग़ालिब की विराट काव्य-दुनिया का सार प्रस्तुत किया। वे कवि-कलाकार अमिताभ सिंह बघेल के साथ संवाद में थे। चर्चा में ग़ालिब की शायरी की बारीकियों, उनके कौशल और उन शेरों पर पुनर्विचार हुआ जिन्होंने दक्षिण एशियाई साहित्यिक रुचि को आकार दिया।

हार्पर कॉलिन्स से प्रकाशित “The Essential Ghalib” एशियन लिटरेरी श्रेणी में नंबर-1 बेस्टसेलर रही है। प्रो. रहमान ने उर्दू रेख़्ता के महानतम कवि का अनुवाद करते समय आने वाली चुनौतियों और अपनी पद्धति पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि वे पुस्तक की शुरुआत ग़ालिब के इस शक्तिशाली शेर से क्यों करते हैं—
नक़्श फ़रियादी है किस की शोख़ी-ए-तहरीर का
काग़ज़ी है पैरहन हर पैकर-ए-तस्वीर का

उनके अनुसार यह शेर पहचान की खोज का रूपक है और इसकी जड़ें ईरानी काव्य-परंपरा से जुड़ी हैं, जो ग़ालिब की बौद्धिक विरासत को और गहन बनाती हैं।

अमिताभ सिंह बघेल ने चर्चा को दार्शनिक विस्तार देते हुए 19वीं सदी के जर्मन दार्शनिक आर्थर शोपेनहावर का उल्लेख किया—जो ग़ालिब के समकालीन थे। उन्होंने रेखांकित किया कि दोनों की रचनाओं में मानवीय पीड़ा, इच्छा और भौतिक संसार की मृगतृष्णा को लेकर एक साझा चिंतन दिखाई देता है।

यह सत्र ग़ालिब को मिथक से बाहर लाकर मनुष्य के रूप में सामने लाता है—उनकी शायरी के साथ, जो आज भी फीकी नहीं पड़ी है। प्रो. रहमान ने अपनी पुस्तक से कुछ शेर उनके अनुवाद सहित सुनाए, जिसे श्रोताओं ने विशेष आनंद के साथ सुना। उन्होंने कहा—“शेर लिखा नहीं, कहा जाता है”—और दीवान-ए-ग़ालिब की मौखिक परंपरा और काव्य-संवेदना का महत्व समझाया।

प्रो. रहमान और अमिताभ सिंह बघेल की बातचीत में ग़ालिब की कालजयी शायरी, बेजोड़ व्यंग्य और दार्शनिक गहराई उभरकर सामने आई—जहाँ रहस्यवादी और रोज़मर्रा का संसार एक-दूसरे में घुल जाता है। सत्र के अंत में प्रो. रहमान ने दिसंबर में आने वाली अपनी आगामी पुस्तक की भी जानकारी दी, जो मीर तक़ी मीर की समस्त ग़ज़लों का संकलन होगी—उर्दू काव्य परंपरा को समर्पित एक और महत्त्वपूर्ण प्रयास।

यह संध्या ग़ालिब को पढ़ने से आगे, उन्हें महसूस करने का अवसर बन गई—एक ऐसे कवि के रूप में, जिनकी आवाज़ समय से मुक्त है।

“250 वर्षों का कालजयी लखनऊ” — तहज़ीब, संस्कृति और सतत विरासत पर एक विचारोत्तेजक सत्र

250 Years of Timeless Lucknow” शीर्षक से आयोजित यह आकर्षक सत्र लखनऊ की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और ढाई सौ वर्षों में उसके गरिमामय विकास पर केंद्रित रहा। इस संवाद में पंकज भदौरिया, डॉ. पी. सी. सरकार, पार्थ सारथी सेन शर्मा और आभा सिंह जैसे विशिष्ट वक्ताओं ने भाग लिया और लखनऊ की तहज़ीब के स्थायी स्वरूप पर अपने-अपने दृष्टिकोण साझा किए।

चर्चा की शुरुआत लखनऊ की तहज़ीब—उसकी नफ़ासत, समावेशिता और सांस्कृतिक संवेदनशीलता—के विकास और निरंतरता से हुई। वक्ताओं ने बताया कि कैसे समय के साथ शहर ने बदलाव स्वीकार किए, लेकिन अपने मूल संस्कारों को कभी नहीं छोड़ा। लखनऊ की पहचान उसकी इमारतों, खान-पान, हस्तशिल्प और रोज़मर्रा के सामाजिक व्यवहार से मिलकर बनती है। रूमी दरवाज़ा की भव्यता से लेकर छोटा इमामबाड़ा की शांति तक, यह शहर अपने आप में एक जीवंत संसार है, जहाँ इतिहास और सौंदर्य सहज रूप से साथ चलते हैं।

पैनल में चिकनकारी की बारीक कारीगरी, नक्काशीदार दरवाज़ों और मेहराबों की शालीनता, तथा गलियों और घरों में झलकती सौम्यता पर विशेष चर्चा हुई। वहीं टुंडे कबाब और अवधी व्यंजनों का ज़िक्र लखनऊ की सांस्कृतिक परिष्कृति के प्रतीक के रूप में हुआ—जहाँ स्वाद, धैर्य और पूर्णता, नफ़ासत और नज़ाकत के मूल्यों का प्रतिबिंब हैं।

प्रत्येक वक्ता का परिचय उनकी सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और सामाजिक योगदान के संदर्भ में कराया गया, जिससे यह समझ और गहरी हुई कि लखनऊ की परंपराएँ बदलते समय के साथ खुद को ढालते हुए भी अपनी गरिमा कैसे बनाए रखती हैं। सत्र में यह रेखांकित किया गया कि लखनऊ की तहज़ीब केवल स्मारकों या व्यंजनों तक सीमित नहीं है, बल्कि भाषा, व्यवहार और लोगों की सामूहिक स्मृति में जीवित रहती है।

सत्र का समापन इस विचार के साथ हुआ कि 250 वर्षों बाद भी लखनऊ शालीनता, सामंजस्य और सांस्कृतिक निरंतरता का प्रतीक बना हुआ है—एक ऐसा शहर जो आत्मा और संवेदना में आज भी उतना ही कालजयी है, जितना अपने इतिहास में रहा है।

पारदर्शिता: सरकार और जनता के बीच भरोसे का सबसे मजबूत पुल

पुस्तक लोकार्पण: मैं तुमसे कुछ कहना चाहती हूँ
(नोबेल पुरस्कार विजेता एलिस मुनरो की चुनिंदा कहानियों का हिंदी रूपांतरण)

उत्सव के अंतर्गत आयोजित विशेष साहित्यिक सत्र “पुस्तक लोकार्पण: मैं तुमसे कुछ कहना चाहती हूँ” में विश्व-प्रसिद्ध लेखिका और नोबेल पुरस्कार विजेता एलिस मुनरो की चुनिंदा लघु कथाओं के हिंदी अनुवाद का विमोचन किया गया। इस पुस्तक का अनुवाद और प्रस्तुति आनंद यशपाल ने की, जिन्होंने लोकार्पण के दौरान अपने अनुभव, अनुवाद-प्रक्रिया और रचनात्मक चुनौतियों पर विस्तार से विचार साझा किए।

इस सत्र में साहित्यिक अनुवाद की अहमियत को रेखांकित किया गया—कि किस तरह अनुवाद भाषाओं और संस्कृतियों के बीच सेतु बनकर विश्व साहित्य को हिंदी पाठकों के अधिक निकट लाता है। मानवीय संबंधों की सूक्ष्मता और भावनात्मक गहराई के लिए जानी जाने वाली एलिस मुनरो की कहानियाँ इस संग्रह में हिंदी में एक सजीव, संवेदनशील और सहज अभिव्यक्ति पाती हैं।

चर्चा के दौरान आनंद यशपाल ने पुस्तक से जुड़े महत्वपूर्ण पक्षों पर बात की और मुनरो की नाज़ुक कथात्मक शैली के अनुवाद में अपनाए गए अपने दृष्टिकोण को स्पष्ट किया। उन्होंने बताया कि मूल रचनाओं की भावनात्मक बनावट, सांस्कृतिक संदर्भों और कथ्य की लय को सुरक्षित रखते हुए हिंदी पाठक के अनुभव के अनुरूप ढालना एक जटिल लेकिन रचनात्मक प्रक्रिया रही। उनकी बातचीत ने अनुवाद-कला की बारीकियों और अनुवादक की भूमिका को एक सांस्कृतिक मध्यस्थ के रूप में समझने का अवसर दिया।

अनुवादक परिचय
आनंद यशपाल एक प्रतिष्ठित साहित्यिक अनुवादक और प्रिंट-ब्रॉडकास्ट पत्रकार हैं। उनका लेखन और पत्रकारिता कार्य कनाडियन ब्रॉडकास्टिंग कॉरपोरेशन, मॉन्ट्रियल गज़ेट, ला प्रेस, ग्लोब एंड मेल, द हिंदू और डॉन जैसे प्रमुख अंतरराष्ट्रीय और भारतीय प्रकाशनों में प्रकाशित हुआ है। वे कनाडा की नोबेल पुरस्कार विजेता लेखिका एलिस मुनरो की तीन कृतियों का हिंदी अनुवाद प्रकाशित कर चुके हैं, साथ ही हिंदी साहित्य का फ्रेंच भाषा में अनुवाद भी किया है। उन्होंने Wordspeak स्तंभ की दो संकलन पुस्तकें लिखी हैं और यशपाल की रचनावली सहित छह अन्य कृतियों के संकलन एवं संपादन का कार्य भी किया है।

भारत के श्रम बाज़ार में स्किल संकट ?

इस साहित्यिक सत्र में लेखक, अनुवादक, शोधार्थी और साहित्य-प्रेमी बड़ी संख्या में उपस्थित रहे। वैश्विक साहित्य के साथ हिंदी के सार्थक संवाद के लिए इस आयोजन की व्यापक सराहना हुई। “मैं तुमसे कुछ कहना चाहती हूँ” को समकालीन हिंदी अनुवाद साहित्य में एक महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में देखा गया, जो यह साबित करता है कि एलिस मुनरो की कथा-दृष्टि भाषाओं और संस्कृतियों की सीमाओं से परे आज भी उतनी ही प्रासंगिक और प्रभावशाली है।

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  • Ankit Awasthi

    Regional Editor

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    One thought on “मेटाफर लिट फेस्ट – लखनऊ का सबसे बड़ा साहित्यिक मंच हुआ गुलज़ार

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