ग़ालिब आज होते तो एल्गोरिद्म से सवाल करते: जन्मदिन विशेष : 27 दिसंबर को मिर्ज़ा ग़ालिब का जन्मदिन मनाते हुए उन्हें केवल उर्दू शायरी का महान प्रतीक मान लेना एक सुरक्षित लेकिन अधूरा दृष्टिकोण है। ग़ालिब को समझना दरअसल उस असुविधाजनक प्रश्न से टकराना है जिसे हर सभ्यता टालना चाहती है—मनुष्य कौन है, और वह अपने ही बनाए ढाँचों में कितना अकेला हो चुका है। 1797 में जन्मे ग़ालिब जिस दौर में लिख रहे थे, वह राजनीतिक पतन, सत्ता के पुनर्गठन और मूल्य-व्यवस्था के ढहने का समय था। यह संयोग नहीं है कि उनकी शायरी आज के डिजिटल युग में पहले से अधिक प्रासंगिक लगती है।
ग़ालिब का समय औपनिवेशिक शासन की शुरुआत का था, जब सत्ता केवल हथियारों से नहीं, बल्कि समय, भाषा और सोच पर नियंत्रण से स्थापित की जा रही थी। उन्होंने सत्ता के इस नए रूप को पहचाना। इसलिए ग़ालिब की कविता प्रतिरोध का नारा नहीं बनती, बल्कि प्रतिरोध की चेतना पैदा करती है। वे किसी विचारधारा के प्रचारक नहीं थे, बल्कि हर विचारधारा पर सवाल उठाने वाले कवि थे। यही कारण है कि वे किसी एक राजनीतिक ध्रुव के लिए सुविधाजनक नहीं रहे—न तब, न अब।
आज, जब राजनीति भावनाओं के सरलीकरण और पहचान की आक्रामकता पर टिकी है, ग़ालिब असहज करते हैं। वे स्पष्ट पक्ष नहीं लेते, बल्कि स्पष्टता की माँग करते हैं। उनकी शायरी हमें बताती है कि सबसे खतरनाक स्थिति वह होती है जब मनुष्य ने सोचना छोड़ दिया हो और केवल मानने लगा हो। ग़ालिब इसी ‘मान लेने’ की मानसिकता के खिलाफ खड़े दिखाई देते हैं।
आधुनिक युग में यह मानसिकता एल्गोरिद्म के रूप में लौट आई है। आज हमारा भोजन, हमारी पसंद, हमारी ख़बरें और यहाँ तक कि हमारे विचार भी डेटा मॉडल तय कर रहे हैं। कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) सुविधा देती है, लेकिन सवाल यह है—क्या वह चेतना भी देती है? ग़ालिब की शायरी ठीक इसी बिंदु पर हस्तक्षेप करती है। वे तकनीक के विरोधी नहीं होते, अगर आज जीवित होते, लेकिन वे यह ज़रूर पूछते कि क्या सुविधा मनुष्य को अधिक स्वतंत्र बना रही है या अधिक आश्रित।
आधुनिक व्यक्ति पहले से अधिक जुड़ा हुआ है, फिर भी पहले से अधिक अकेला है। सोशल मीडिया ने संवाद को बढ़ाया है, संबंध नहीं। यही वह अकेलापन है जिसे ग़ालिब बहुत पहले पहचान चुके थे—भीड़ में खड़ा व्यक्ति, भीतर से टूटा हुआ। उनकी शायरी प्रेम की नहीं, उस रिक्तता की शायरी है जो प्रेम के बाद, विश्वास के टूटने के बाद और अर्थ के बिखरने के बाद बचती है।
राजनीतिक रूप से भी ग़ालिब आज के समय में असहज होते। वे सत्ता के उत्सव का हिस्सा नहीं बनते, न ही पीड़ित होने की स्थायी मुद्रा अपनाते। वे सत्ता और पीड़ित—दोनों से सवाल करते। यही कारण है कि ग़ालिब को पाठ्यक्रमों में रखा गया, लेकिन सार्वजनिक विमर्श से धीरे-धीरे हटा दिया गया। क्योंकि ग़ालिब नागरिक नहीं, व्यक्ति को संबोधित करते हैं—और व्यक्ति हमेशा सत्ता के लिए जोखिम होता है।
यह भी महत्वपूर्ण है कि ग़ालिब धार्मिक कट्टरता के दौर में आध्यात्मिक प्रश्न पूछते हैं, धार्मिक उत्तर नहीं देते। वे ईश्वर से बहस करते हैं, डरते नहीं। आज, जब आस्था को पहचान की राजनीति में बदला जा चुका है, ग़ालिब की यह निर्भीकता और भी ज़रूरी हो जाती है। वे हमें सिखाते हैं कि सवाल करना नास्तिकता नहीं, बल्कि बौद्धिक ईमानदारी है।
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ग़ालिब का महत्व इसीलिए बढ़ जाता है कि वे किसी समाधान का भ्रम नहीं बेचते। वे कहते हैं—जीवन जटिल है, और उसे सरल नारों में नहीं समझा जा सकता। आज के ‘त्वरित समाधान’ वाले युग में, जहाँ हर समस्या का ऐप मौजूद है, ग़ालिब हमें ठहरने को कहते हैं। सोचने को कहते हैं। असुविधा स्वीकार करने को कहते हैं।
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27 दिसंबर को ग़ालिब को याद करना महज़ साहित्यिक अनुष्ठान नहीं होना चाहिए। यह उस परंपरा को बचाने का प्रयास होना चाहिए जिसमें मनुष्य को उपभोक्ता या डेटा पॉइंट नहीं, एक सोचने वाला प्राणी माना जाता है। अगर आज ग़ालिब होते, तो वे शायद शेर नहीं, सवाल लिखते—और वही सवाल आज भी हमारे लिए सबसे ज़रूरी हैं।









